विज्ञापन की होड़

क्या आपके टूथपेस्ट में नमक है? नए कोलगेट एक्टिव साल्ट मे नमक है……, असली मसाले सच- सच एमडीएच-एमडीएच…,
पहले इस्तेमाल करें फिर विश्वास करें…. अगर टाटा स्काई लगा डाला तो लाइफ झिंगालाला….
ENO- काम शुरू सिर्फ 6 सेकेंड में।।
आप लोग सोच रहे होंगे कि मैं सिरफिरा गया हूं क्या जो इस लौकडाउन में फालतू के विज्ञापन गाए जा रहा हूं। मैं आप लोगों को बता दूं कि मैं बॉखलाया नहीं हूं, बस उतावला हो रहा हूं अपने नए-नए अधूरे सामान्य ज्ञान को साझा करने के लिए।

मैं हमेशा से ही टीवी का बेहद शौकीन रहा हूं। खासतौर से बचपन में कार्टूनों का चहेता रहा हूं और अब ‘सब टीवी’ चैनल के बेहद लोकप्रिय कार्यक्रम ‘तारक मेहता का उल्टा चश्मा’ का प्रशंसक हूं। अब समय के साथ समाचारों व पारिवारिक धारावाहिकौं और फिल्मों में भी रुझान आने लगा है। पहले मैं सोचा करता था कि इन टीवी वालों को हमारी आंखों की बड़ी फिक्र है जो हर 2 मिनट में विज्ञापन दे देते हैं। वह भी एक ही चैनल पर पूरे दिन वही घिसे पिटे विज्ञापन-
कुरकुरे: टेढ़ा है पर मेरा है….. , थम्स अप:आज कुछ तूफानी करते हैं…. , मेंटोस: दिमाग की बत्ती जला दे….।।

फिर हम भोली भाली जनता, जो या तो अनपढ़ है या राजनीति और समाज के तौर तरीकों से अनभिज्ञ, का इस सब के प्रति आकर्षण विज्ञापनकर्ताओं के उद्देश्य पूरा होने में एक बड़ा कदम होता है। मैं खुद जब तक किसी ब्रांड का गुणगान 10 जगह से नहीं सुन लेता, उसकी विश्वसनीयता पर यकीन नहीं होता। सही भी है, जब तक स्वयं में कोई विशिष्टता ना हो, भीड़ में चलने में ही भलाई है।

अब समय के साथ यह समझ में आने लगा है कि कलियुग में मुंह से निकले वचनों का तो कोई मोल है नहीं इसलिए गवाहों का बोलबाला है और आज सिर्फ 4 ईंट लगाकर खोखा बना लेने मात्र से आपका सामान बिक जाएगा, इसकी कोई गारंटी नहीं होती। एक थोक विक्रेता या खुदरा व्यापारी तो व्यापार ना चलने पर दूसरा धंधा पकड़ने का जोखिम उठा भी सकता है पर जिसके बड़े-बड़े कारखाने हैं, मिले हैं, जहां सैकड़ों कर्मचारी पगार पर हैं, वे तो इसके बारे में सपने में भी नहीं सोच सकते। उनके लिए तो किसी प्रोडक्ट का ना चलना मानो पैरों तले जमीन खिसकना है। फिर वे अपना धंधा बचाने के लिए क्या कर सकते हैं?

भारत का संविधान विश्व का लिखित सबसे बड़ा संविधान है। मीडिया हमारे लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है। यह हमें देश-विदेश में होने वाली हर छोटी-बड़ी गतिविधि से परिचित कराती है। देश में सैकड़ों समाचार एजेंसियाँ कार्यबद्ध है। इनका काम लोगों तक सही खबर पहुँचाना होता है। इन एजेंसियों में भी सैकड़ों कर्मचारी जैसे रिपोर्टर, कैमरामैन व अन्य विशेषज्ञ तैनात रहते हैं। एजेंसी के मालिक को इस सब की सुव्यवस्था व सभी के वेतन का भारी खर्चा उठाना पड़ता है। अब जो एजेंसी जितनी ठोस, जल्दी और जितनी विस्तृत जानकारी देगी, दर्शकों का उसको उतना ही अधिक प्यार व समर्थन हासिल होगा। वर्तमान में प्रिंट में ‘दैनिक जागरण’ एवं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में ‘आज तक’ का वर्चस्व है। इसका कारण इनकी स्वयं में ही प्रामाणिकता व विशेषता है। ‘दैनिक जागरण’ तो 2003 ईस्वी से ही नंबर-1 अखबार बना हुआ है। अब सवाल यह उठता है कि इनकी कमाई का जरिया क्या है?

अब हम टीवी पर चलते हैं। टीवी पर कई चैनल और उन पर कई कार्यक्रम प्रसारित होते हैं। हर कार्यक्रम की कई कड़ियां और हर कड़ी में कई कलाकार होते हैं। एक कार्यक्रम बनाने में उसके निर्माता को कड़ी मशक्कत करनी पड़ती है व अपना समय और मोटी रकम खर्च करनी पड़ती है। एक कार्यक्रम में पर्दे के पीछे भी कई कलाकार होते हैं जैसे निर्माता, लेखक, निर्देशक, कास्टिंग डायरेक्टर, संगीतकार, कॉस्टयूम डिजाइनर, कैमरामैन, डेकोरेटर आदि। ऐसा हर कार्यक्रम एवं चैनल के साथ मान्य है। इन सभी कलाकारों का व्यय निर्माता कैसे उठाएगा? चैनल वाले की कमाई कैसे होगी? इन सभी सवालों का जवाब इन सवालों में ही निहित है।

अब हम आते हैं मूल शीर्षक ‘विज्ञापन’ पर। उपर्युक्त सभी प्रश्नों का जवाब विज्ञापन ही है। विज्ञापन ना महज किसी समाज या मुल्क का, बल्कि पूरे संसार में मुद्रा के प्रसार का एक बेशकीमती स्त्रोत है। किसी भी प्रोडक्ट के विज्ञापन में, चाहे वह साबुन, शैंपू, लिपस्टिक, हेयर डाई आदि कॉस्मेटिक सामान का हो या फिर डेरी मिल्क, किटकैट, एक्ट ll पॉपकॉर्न, मसाले, आटे या अन्य किसी खाघ या भोज्य पदार्थ का हो, किसी प्रकार के कपड़े की ब्रांड का हो, इन सब में पसंदानुसार विज्ञापनकर्ताओं को किसी प्रिंट या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को अच्छा खासा रोकड़ा देना पड़ता है। इससे ही लोगों तक यह भ्रांति फैलती है कि फलाँने वस्तु की बड़ी मांग है। यह निश्चित ही सबसे उत्तम वस्तु है।

भारत का क्रिकेट बोर्ड बीसीसीआई विश्व का सबसे अमीर क्रिकेट बोर्ड माना जाता है और भारत के क्रिकेटर्स सबसे रईस क्रिकेटर्स। क्रिकेट बोर्ड के पास इतना राजस्व आता कहां से है? सभी एथलीट अरबों में कैसे खेल जाते हैं? पर्दे के पीछे कार्य करने वाले सभी को वेतन कैसे मिल जाता है? सिर्फ दर्शकों के टिकट के पैसों से अगर ऐसा होता तो तमाम क्रिकेट बोर्ड इस लॉक डाउन में खाली मैदानों में मुकाबले कराने की कल्पना भी नहीं करते। खेल बोर्डों को भी खजाना ऐडों से ही मिलता है। यहां मामला उलट है। तमाम टीवी चैनलों में होड़ रहती है खेलों का प्रसारण देने के लिए। जिसकी अपने आप में ही बहुत मांग हो वह भला विज्ञापन क्यों देना चाहेगा…उसे पागल कुत्ते ने थोड़े ही काटा है। उदाहरण के तौर पर क्रिकेट लीग आईपीएल को ही ले लीजिए। हर साल ‘सोनी मैक्स’ चैनल क्रिकेट बोर्ड को इसके प्रसारण के अधिकार लेने के लिए मोटी रकम देता है, जिसे फिर हर ओवर के बाद वही एक सिर पकाऊ ऐड देने के लिए कंपनियां बहुत रोकड़ा देती हैं। इससे ही तो उस चैनल का खर्चा चलता है और वह अपने यहां नौकरी करने वाले कर्मचारियों को वेतन देने के बावजूद लाभ उठा पाता है। ऐसा सभी चैनलों के साथ मान्य है।

हाल ही में ‘दूरदर्शन’ पर प्रसारित होने वाली रामानंद महासागर की रामायण को आंकड़ों के मुताबिक पूरी दुनिया में लगभग 7.7 करोड़ लोगों ने देखकर नया कीर्तिमान स्थापित किया। उन लोगों ने इस बीच आने वाले विज्ञापनों को भी देखा ही होगा। तमाम विज्ञापनकर्ताओं ने चैनल वाले को कितनी रकम दी होगी जिससे उनका खर्चा भी चल गया और ऐडकर्ताओं के प्रोडक्ट की ब्रांड वैल्यू भी बढ़ गई और लोगों को उन्हें खरीदने के लिए जरूरी ट्रिगर भी मिल गया। हालांकि इस बार ‘दूरदर्शन’ को ‘रामायण’ के पुनः प्रसारण के लिए रकम अदा नहीं करनी पड़ी।

कुल मिलाकर विज्ञापनों का भी अपना ही महत्व है। चाहें वो टीवी पर हो या समाचार पत्रों में, चुनावों में खड़े नेताओं द्वारा हो या स्कूलों और कोचिंग सेंटरों में बच्चों की भीड़ लगाने के लिए हो। अर्थव्यवस्था की एक लंबी चेन है जिसमें हर किसी को एक दूसरे का सहयोग करना ही पड़ता है।

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